₹81,000 करोड़ की महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, ग्रीनफ़ील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र और नई टाउनशिप विकसित होगी — 2032 तक चरणबद्ध पूर्णता का लक्ष्य, पर्यावरणीय मंज़ूरी तथा सतत विकास व जनजातीय कल्याण के सुरक्षा-उपायों के साथ।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप जल्द ही भारत के समुद्री और आर्थिक मानचित्र पर एक नई पहचान बनकर उभर सकता है। केंद्र सरकार की लगभग ₹81,000 करोड़ की 'ग्रेट निकोबार एकीकृत विकास परियोजना' (GNIDP) का लक्ष्य इस सामरिक रूप से अहम द्वीप को एक प्रमुख समुद्री व व्यापारिक केंद्र में बदलना है।
योजनाकारों के अनुसार यह परियोजना केवल एक ढाँचागत निर्माण नहीं, बल्कि देश की समुद्री क्षमता, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क को एक साथ सशक्त करने वाली दूरगामी पहल है, जिसका लाभ आने वाले दशकों तक मिलने की उम्मीद है।
परियोजना की सबसे बड़ी ताक़त इसका भौगोलिक स्थान है। ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य के निकट है — वह व्यस्त समुद्री मार्ग जिससे होकर वैश्विक व्यापार का लगभग 40% प्रवाहित होता है। सामरिक मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि यहाँ एक आधुनिक बंदरगाह और ढाँचागत केंद्र विकसित होने से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति और निगरानी क्षमता उल्लेखनीय रूप से मज़बूत होगी, और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में देश की स्थिति अधिक सुदृढ़ बनेगी।
परियोजना के केंद्र में देश के सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक — अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) — होगा। इससे भारत को वह ट्रांसशिपमेंट कारोबार अपने यहाँ लाने का अवसर मिलेगा, जिसके लिए अब तक काफ़ी हद तक विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है। साथ ही एक ग्रीनफ़ील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, समर्पित बिजली संयंत्र और सुनियोजित नई टाउनशिप विकसित की जाएगी। इनसे रोज़गार, पर्यटन, व्यापार और निवेश के नए अवसर खुलने की प्रबल संभावना है।
एक ही स्थान पर बंदरगाह, हवाई अड्डा, ऊर्जा और आवासीय ढाँचे का एकीकृत विकास इसे एक 'समग्र' परियोजना बनाता है, जो दीर्घकाल में द्वीप को आत्मनिर्भर आर्थिक केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है।
परियोजना को एक साथ नहीं, बल्कि चरणों में पूरा करने की योजना है, जिसकी अंतिम समय-सीमा 2032 निर्धारित की गई है। चरणबद्ध दृष्टिकोण से ढाँचागत निर्माण, संसाधन-प्रबंधन और निगरानी को व्यवस्थित एवं नियंत्रित ढंग से आगे बढ़ाया जा सकेगा, जिससे गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों बनी रहें।
परियोजना को पर्यावरणीय मंज़ूरी प्राप्त हो चुकी है। सरकार का कहना है कि विकास और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन इस योजना का अभिन्न हिस्सा है। इसमें वनीकरण व संरक्षण उपायों के साथ-साथ द्वीप के मूल निवासी शोम्पेन और निकोबारी समुदायों के कल्याण तथा उनके अधिकारों की सुरक्षा के प्रावधान शामिल बताए गए हैं। योजनाकारों के अनुसार पारदर्शी निगरानी और सतत-विकास सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा, ताकि विकास का लाभ क्षेत्र की प्रकृति और लोगों — दोनों तक पहुँचे।
कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार एकीकृत विकास परियोजना सामरिक सुरक्षा, आर्थिक वृद्धि और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को एक साथ साधने वाली एक दूरगामी पहल के रूप में देखी जा रही है। यदि सतत-विकास के संकल्पों और मज़बूत सुरक्षा-उपायों के साथ इसका क्रियान्वयन होता है, तो यह आने वाले वर्षों में हिंद महासागर में भारत की एक नई और सशक्त पहचान गढ़ सकती है।